दौरे-तरक्की नहीं कुछ बेसुरों का राग है
दौरे-तरक्की नहीं कुछ बेसुरों का राग है
कागजों पर महकता हिन्दुस्तानी बाग़ है सबको मिलेगी रौशनी बड़े बड़े वादे कर गुपचुप तेल पी रहा खुदगर्ज़ चिराग़ है
मायूस हुआ किसान सोना हरा उगा कर
जम्हूर के आसमान से बरसता आग है
दाल दिखता नहीं है खाने की थाली मे तरकारी...
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सुलभ § सतरंगी
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[20 May 2010 02:03 AM]



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