गैर का ख़त मेरे नाम आया है
दफ्अतन तुम पे इक निगाह पड़ीदिल की दुनिया को हार बैठे हमज़िंदगी थी मेरी अमानत-ए-गैरउसको तुम पर ही हार बैठे हम####वक्त रूख़्सत हुआ मोहब्बत काअब के नफरत का दौर आया हैज़िंदगी दर्द-ए-दिल को पूजती हैतुम से बिछड़े तो याद आया हैअब के फिर ना मिलें ख़्यालों...
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Razi Shahab
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[20 May 2010 02:07 AM]



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