रूह
मेरी रूह जो कबसे खामोश बैठी है एक बार बोली थी कुछ ख़ुशी में गुनगुनायी भी थी उस दिन जब तुम मेरे करीब आई थी मगर उस दिन के बाद अब तलक न कोई बोल उठा न कोई आवाज़ हुई बस एक उदास शाम के जैसे यह हर रोज़ मेरे घर...
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tarun
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[19 May 2010 18:34 PM]



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