और हर फ़िकरे कश की एक औक़ात होती है.....

काव्य मंजूषा मसक जातीं हैं,  अस्मतें,किसी के फ़िकरों की चुभन से,बसते हैं मुझमें भीहया में सिमटेआदम और हौवा,जो झुकी नज़रों सेदेखते हैं, खुल्द के फल का असर,दिखाती हैंसही फ़ितरत, इन्सानों की,उनकी तहज़ीब-ओ-बोलियाँ, वर्ना पैरहन के नीचे  सबका सच एक... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[19 May 2010 18:11 PM]

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