निर्मोही

आर्जव तुम्हारे शब्दों में कुछ फूल हॊते हैं ! उन्हें छूकर मैं जाग जाता हूं ! जगाओगे नहीं मुझे ? निष्ठुर ! तुम्हारी चहकन में कुछ रंग होते हैं ! उनके परस से मैं बहक जाता हूं ! बहकाओगे नहीं मुझॆ ? पाथर ! इन रंग और शब्दों से मेरी सांस बनती है ! आंखॊं में चमक पिघलती... [पूरी पोस्ट]
writer आर्जव

कविता

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[19 May 2010 17:00 PM]

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