तल्ख़ जुबां की किरचें
खुद को समेटते समेटते चुभ गयीं हैं किरचें कुछ तल्ख़ जुबां की , सहलाते हुए शब्दों का मरहम भी
अब बेअसर हो मन को लहुलुहान किये जाता है.. ...
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sangeeta swarup
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[19 May 2010 08:28 AM]



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