उन्नीस मई का दिन, शादी के बाद की पहली रात

अनवरत रात्रि एक बजे सरदार को फिर घोड़ी पर बिठाया गया। इस बार जलूस सीधे दुल्हिन के घर पहुँचा। तोरण मार अंदर पहुँचे तो कन्यादान हुआ और दुल्हा-दुल्हिन के बाएँ हाथ बीच में मेहंदी और कुछ अन्य चीजों की पिसी लुगदी रख सूत के लच्छे से बांध दिए गए। फिर बंधे बंधे ही मंडप... [पूरी पोस्ट]
writer दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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[19 May 2010 08:20 AM]

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