“उम्र तमाम हो गई” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)
पथ पर आगे बढ़ते-बढ़ते, अब जीवन की शाम हो गई! पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते, सारी उम्र तमाम हो गई!! जितना आगे कदम बढ़ाया, मंजिल ने उतना भटकाया, मन के मनके जपते-जपते, माला ही भगवान हो गई! पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते, यों ही उम्र तमाम हो गई!! चिढ़ा रही मुँह...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
गीत
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[19 May 2010 07:50 AM]



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