अटकन - बटकन, दहिया चटकन
यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "केवल तुक मिलाती इस कविता का अर्थ आज भी नहीं पता, लेकिन इसे...
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Vibha Rani
बाल - कविता
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[19 May 2010 07:42 AM]



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