नींद और गालिब
चचा गालिब तुम होते तो पूछता कि सचमुच नींद रात भर क्यों नहीं आतीइस शहर में जहाँ न वस्ल की बातें है न इश्क के किस्सेबस यूँ ही पडा रहता हूँ हर रात एक नींद के इंतज़ार मेंबताओ न क्या करे खूने जिगर होने तकये रात चुपचाप आकर मेरे कानो में मेरी उमर के पहाड़े...
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vivek
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[14 Oct 2009 15:36 PM]



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