संतन को सीकरी सूं ही काम

विचार-बिगुल पहली नजर में उपर का शीर्षक ज़रूर पाठकों को अटपटा लगेगा पर सच्चाई से मुंह मोड़ना रचनाकार का काम नहीं है। रहे होंगे कभी संत कवि कुम्भन दास। जाने किस भावावेश में कह गए, संत को कहाँ सीकरी सूं काम। जबकि इतिहास गवाह है कि हमने हमेशा सत्ता के गलियारों के आश्रय... [पूरी पोस्ट]
writer Dr M.S. Parihar
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[19 May 2010 04:59 AM]

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