पाँचवीं क़िस्त - कौन चला बनवास रे जोगी
पाँचवीं क़िस्त की ये तीन ग़ज़लें मुलाहिज़ा कीजिए-बाबा कानपुरीरहता नित उपवास रे जोगीमन में अति उल्लास रे जोगीकुछ तो है जो कसक रहा हैक्या मन में संत्रास रे जोगीझर-झर बहते नैना जैसेबारिश बारह मास रे जोगीसूनी-सूनी दसों दिशाएंकौन चला बनवास रे जोगीव्यसनों की चादर...
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सतपाल ख़याल
कौन चला बनवास रे जोगी
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[19 May 2010 04:35 AM]



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