स्पष्ठीकरण !

अंधड़ ! इर्द-गिर्द सदा ही घूम पाता, मैंने तोतुमसे वो धूरी माँगी थी, दूरी नहीं,दिल की बात हम हक़ से कह जाते,वो सहभागिता माँगी थी, मजबूरी नहीं !मेरे दिल में रखने की आदत बुरी है,हर ख्वाब दिल के कोने में सजाता हूँ,इजहार-ए-इश्क मेरी पलकें कर लेती है ,हर बात लबों पे... [पूरी पोस्ट]
writer पी.सी.गोदियाल

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[19 May 2010 03:10 AM]

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