झोंका जो आया अतीत की खिड़की से
अनार के दाने ही थे वो पल गिलहरी की तरह गुदगुदाते आए फिर बह गए वो शहतूत की बेरियां कच्चे आमों की नटखट अटखेलियां आसमान के जितने टुकड़े दिखते अपनेपन से भरे लगते घर का फाटक और फाटक के पास से गुजरते लोग उनके चेहरे के भाव जो घर आते, वो भी भले लगते न आने वाले...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[19 May 2010 03:03 AM]



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