तुम श्लील कहो, अश्लील कहो, जो दिखता है वो लिखता हूँ मन्दिर में नहीं, मण्डी में हूँ , जो बिकता है वो लिखता हूँ
अविनाश वाचस्पति जी !आज पहली बार आपने एक ऐसी टिप्पणी की है जो मुझे आपकी नहींलग रही बल्कि किसी और के कहने पर अथवा दबाव पर की गई कुचरनी लगती है । जो भी हो, मुझे अपने लेखन के बारे में कोईसफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैंने क्या लिखा है...
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[19 May 2010 01:03 AM]



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