सखी न कुछ भी भाता आज !
सखी न कुछ भी भाता आज ! गुंजित मधुर कूक कोयल की, मादक अलियों का सरसाज ! सखी न कुछ भी भाता आज ! आज न भाता मदिर भाव से प्रमुदित ऊषा का आना,आज न भाता मृदु मलयानिल का सुमनों को छू जाना,अरी न भाती चंद्र ज्योत्सना और न रजनी का प्रिय साज ! सखी न कुछ भी भाता आज !...
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Sadhana Vaid
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[18 May 2010 21:01 PM]



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