युवा कवि नितिन फलटणकर की रचना-दिल्ली
दिल्ली तो बस डूब रही है छोटे-छोटे गलियारों में।सत्ता के संघर्षों में और नेता के ललकारों में।इस बिंदी की लाली, अब धीरे-धीरे उतर रही है।अपनों की ही मौंतों से दिल्ली, सुलग-सुलग कर जल रही है।अब रास्ते भी दिल्ली के कुछ सूने सूने लगते हैं।जिनको हम आदर्श मानते,...
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Kulwant Happy
अतिथि कोना
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[18 May 2010 20:55 PM]



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