मैं बंद गली का हूँ वो आखिरी मकाँ ....

काव्य मंजूषा मेरे दिल में अब वो हाजत नहीं रहीतुम्हें बाँधने की अब आदत नहीं रही जिस्म तो खड़ा हुआ है बस यहीं कहींरूह से मगर कोई निस्बत नहीं रही मैं बंद गली का हूँ वो आखिरी मकाँ  रास्तों को जिसकी जरूरत नहीं रहीनिस्बत=रिश्तागीत तो आप सुन चुके हैं लेकिन फिर सुन... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[18 May 2010 20:07 PM]

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