भाग्य ध्वनी का बैरी मानव

9th Dimension's Base भाग्य ध्वनी का बैरी मानव, वैचारिकता क्या समझाएगालकीरों कि है आंख मिचौली, तो राजयोग कहाँ से पाएगा उगता सूरज नहीं चमकता, तो क्या; चमके बिना ही डूब जाएगा इसी द्वन्द गरल का पान करता, पल-पल कौन जीवित रह पाएगा ना ही लकीरों का मोह मुझे है, ना भाग्यवाद कि चिंता... [पूरी पोस्ट]
writer विशाल कश्यप
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[18 May 2010 19:42 PM]

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