यात्रा और यात्री

ऐसा देश है मेरा सांस चलती है तुझे, चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता, चल रहा आकाश भी है, शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,पांव के नीचे पड़ी, अचला नहीं, यह चंचला है, एक कण भी, एक क्षण भी, एक थल पर टिक न पाता,शक्तियां गति की तुझे, सब ओर से घेरे हुए... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद बिश्नोई
views
7
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[22 Jan 2010 09:30 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix