यात्रा और यात्री
सांस चलती है तुझे, चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता, चल रहा आकाश भी है, शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,पांव के नीचे पड़ी, अचला नहीं, यह चंचला है, एक कण भी, एक क्षण भी, एक थल पर टिक न पाता,शक्तियां गति की तुझे, सब ओर से घेरे हुए...
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विनोद बिश्नोई
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[22 Jan 2010 09:30 AM]



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