देश की धरती
मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पितचाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूंमाँ तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन, किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदनथाल में लाऊं सजा कर भाल जब भी, कर दया स्वीकार लेना वह समर्पणगान अर्पित, प्राण अर्पित, रक्त का कण कण...
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विनोद बिश्नोई
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[22 Jan 2010 09:50 AM]



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