शवों के सौदागर!
श्रीगंगानगर। एक हम हैं कि देश को फिर से सोने की चिडिय़ा बनता देखना चाहते हैं और एक ये सरकारी कारिंदे जो देश को बार-बार कलंकित कर रहे हैं। फर्क बस इतना है कि हर बार चेहरा बदला होता है लेकिन हरकतें वही होती हैं। बेहद अफसोस होता है कि मेरे ऐसे देश में 'ऐसे'...
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विनोद बिश्नोई
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[30 Mar 2010 12:34 PM]



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