खुद से निगाह मिला ना पाया

zakhm सुनोउदासी का लहराता सायाक्या तूने नहीं देखा?जिसे कभी तूकँवल कहा करता थाउस रुखसार पर डला ख़ामोशी कानकाब हटाया तो होता हर तरफ टूटी -बिखरी निराशा में डूबीआहें और ख्वाबों को ही पाया होताहर पग पर सिर्फ ज़ख्मो के ही निशाँटिमटिमाये होते हर तरफ तबाही कामंजर ही... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना
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[18 May 2010 08:20 AM]

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