जलजला कुमार ने स्‍वीकारा ढपोरशंख और मैं सगे भाई हैं

बगीची आज फिर दिन में नींद आ गई। सुबह जलजला सपने में मौजूद रहा। अब यह तो अंदाजा नहीं लग पाया कि वो कितना समय मेरे सपने में रहा। पर जब सुबह 5 बजे नींद खुली तो उसके जाने का अहसास हुआ और मैं एकदम से बिस्‍तर से उठ बैठा। एक चम्‍मच अश्‍वगंधा चूर्ण मुंह में लेकर... [पूरी पोस्ट]
writer अविनाश वाचस्पति

ढपोरशंख

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[18 May 2010 07:20 AM]

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