(ग़ज़ल)साथ-साथ

अशोकनामा Shareवो मेरे ही साथ-साथ चलता रहाआंखों में झूठा ख़्वाब पलता रहाकुछ तो मिट्टी ही अपनी गीली है बारिश में घर से मैं निकलता रहातेरा ख़्याल बहुत रेशमी मेरे हमदमउसे लेकर मैं पत्थरों पे चलता रहाकौड़ियां जोड़ने के वास्ते रहा जीता खर्च सांसों का संग संग चलता रहारेत पर... [पूरी पोस्ट]
writer माणिक

ashok jamnani

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[18 May 2010 06:25 AM]

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