माना तुम्हें शहर ने जगमग जगमग रातें दी होंगी
भरा-भरा सा दिन लगता है लेकिन खाली-खाली शामकहाँ गयी चौपालों वाली बतियाती मतवाली शाम घर जाने का मन होता था मन में घर आ जाता था शाम ढले ही इंतजार में खुलती खिड़की वाली शाम सारे दिन की थकन मिटाती गय्या जैसी लगती थी आँगन के पीपल के नीचे करती हुई जुगाली शाम...
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ravindra sharma ravi
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[18 May 2010 04:19 AM]



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