क्या लिख दूँ कि तुम लौट आओ
किताबें ही किताबें हैं.. टेबल पर उनका एक ढेर बनता जा रहा है… एक मीनार सी बन गयी है… झुकी हुई… कुछ कुछ पीसा की मीनार के जैसी… बस एक दिन गिरेगी धड़धडाकर और उसमे दबे दबे मैं भी किताबों के कीड़ो की मौत मर जाऊँगा… ये सोंचते हुए घंटो उन किताबो को देखता रहता...
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Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
कुछ एं वें ही
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[17 May 2010 18:19 PM]



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