आँखें नम हैं..
वो अपनों को विदा करने आये थे, कुछ उनके हाथ अपनों केलिए संदेसा देने। कुछ आये थे लौट जाने को अपने गाँव अपनों के बीच और कुछ लौट जाने को हमेशा के लिए। फिर एक बार दिल्ली के स्टेशन पर भगदड़ मैं कुछ जाने चली गयीं । कुछ ज़ख़्मी हुए, कुछ चोटिल हुए, कुछ के दिल के घाव...
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rajkumar jha
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[17 May 2010 10:09 AM]



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