अब तो अपनी लेखनी से, नाड़ा ही तू डाल रे!

Samvedana Ke Swar पिछले दिनों पुण्य प्रसून जी के ब्लोग में, मीडिया के गिरते स्तर पर पाकिस्तानी कवि “हबीब जालिब” की कविता पढी, “अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल”...मूल कविता उर्दू में थी और उसका हिन्दी अनुवाद शायद! प्रसून जी ने किया था. मुझें कविता जितनी जानदार और बेबाक लगी उसका... [पूरी पोस्ट]
writer सम्वेदना के स्वर

नाड़ा

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[17 May 2010 09:21 AM]

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