बाघ १४११

कुछ लम्हे दिल से... रहने दो आशियाँ मेरा भीमेरी भी ईश ने रचना कीवाहन बना भवानी माँ का हूँ बाघ शान भारत माँ की क्यूँ मारता मुझे है मानवक्यूँ मैं बना सभी का दोषीगिनती हजार की है केवलसंख्या बहुत बची कम मेरी अस्तित्व गर मिटाया मेराहो जाएगी समाप्त सृष्टीहैं ये हरे वसन धरती के मत... [पूरी पोस्ट]
writer अर्चना तिवारी

ग़ज़ल

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[17 May 2010 05:08 AM]

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