नारी नदी का प्रवाह ...... [कविता एवं स्वर] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
शीर्ष तुंग से क्षरित दुग्ध धार सी धवल सर्पिणी सी इठल मस्त मेघ सी मचल यौवन प्रवेग से शिव जटाजूट घेर स्नेहसिक्त शैलखण्ड उर कठोर दम्भ तोड़ सारे तटबन्ध तोड़ अडिग यतीचित्त को करती हो निर्मल बहती हो कलकल पवन सा उन्मुक्त मन भावयान पर सवार नेह्दृष्टि आकुल...
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श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
कविता
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[17 May 2010 03:57 AM]



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