दौड़ती, अटकती, कहानी
घोड़ा रास्ता भूल गया होगा, एक सरपट तेज़ी से दौड़ता, कुछ आगे जाकर बार-बार अचकचाकर फिर खड़ा रह जाता होगा, ताज़्ज़ुब और तक़लीफ़ में जबड़े चबाता, अपने सोचने को सिलसिले में दुरुस्त करने की कोशिश करता, कि ग़लती कहां हो रही है, कि मन में यह किसने रास खींची...
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Pramod Singh
मन की गांठ
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[17 May 2010 03:57 AM]



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