क्षणिकाए (दर्द)
वो लड़की झांकती झरोखे से शायद कही धोखे सेउसकी झलक दिख जाए सारी तृष्णा मिट जाए वो लड़का कुछ बेखयाल साबिगड़े सुरत-ए-हाल सा रस्सी सा एठा है सबसे खफा बैठा है चार आँखे दो पथ निहारती दो सबकुछ वारती शायद एक हो जाए एक दूजे में खो जाए दो अर्थियां...
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Sonal Rastogi
क्षणिकाएँ
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[17 May 2010 03:26 AM]



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