“गरल ही गरल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
अब हवाओं में फैला गरल ही गरल।क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में मैं गजल।।गन्ध से अब, सुमन की-सुमन है डराभाई-चारे में, कितना जहर है भरा,वैद्य ऐसे कहाँ, जो पिलायें सुधा-अब तो हर मर्ज की है, दवा ही अजल।क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में मैं गजल।।धर्म की कैद में,...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
ग़ज़ल
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[17 May 2010 03:20 AM]



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