प्रदूषण और हम !
कैसा सुन्दर घर-आँगन था,गली-मोहल्ले सारे, ठंडी-ठंडी हवा सुहानी ,प्यार से हमें दुलारे। फूल महकते वन-उपवन में,अपनी बाँह पसारे पशु -पक्षी चहके फिरते,बुझते मन के अंगारे। पर्यावरण-प्रदूषण जबसे हुआ है इस दुनिया में,घुट-घुट कर सब साँस ले रहे, अपनी-अपनी कुटिया...
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संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI
कविता
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[17 May 2010 03:09 AM]



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