कई बार मुड़ मुड़ कर देखा आधा घूँघट खोल

Kavi Sammelan नयन अधमुंदेअधर अधखुलेलरज़े लाल कपोलउस पर भी कुछ कमी दिखी तो बोल दिये दो बोलदीवानों परक्या गुज़रेगीतुमने कभी न सोचाकई बार मुड़ मुड़ कर देखा आधा घूँघट खोलरचयिता : रामरिख मनहर प्रस्तुति : अलबेला खत्री www.albelakhatri.कॉम... [पूरी पोस्ट]
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[17 May 2010 00:20 AM]

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