अभी तलक भी घुली हुई हैं
तुम्हारी नजरें जहाँ गिरी थीं, कपोल पर से मेरे फिसल करहमारी परछाईयां उस जगह में अभी तलक भी घुली हुई हैंहुई थी रंगत बदाम वाली हवा की भीगी टहनियों कीसजा के टेसू के रंग पांखुर पर, हँस पड़ी थी खिली चमेलीमहकने निशिगंध लग गई थी, पकड़ के संध्या की चूनरी कोऔ बीनती...
[पूरी पोस्ट]
राकेश खंडेलवाल
11
2
0
2
5
[16 May 2010 21:47 PM]



Shuffle








