सबके मन को भाए : दीनदयाल शर्मा की एक बालकविता
सबके मन को भाएइसके बिन है सरकस सूना,दर्शक एक न आए।उल्टे-सीधे कपड़े पहने,करतब ख़ूब दिखाए।गुमसुम कभी न देखा इसको,हर पल यह मुस्काए।ख़ुद तो हँसता ही रहता है,सबको ख़ूब हँसाए।गिरते-गिरते बच जाता यह,पल-पल में इतराए।जोकर ही हो सकता है, जोसबके मन को भाए।दीनदयाल...
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रावेंद्रकुमार रवि
बालकविता
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[16 May 2010 19:59 PM]



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