ढाल [चित्र काव्य]
पहले से ही दिखी भवन में आती अमा अरे! चुपचाप.होली खेल रहा था छिपकर तेल जला तम से दिव-ताप. नत थे दोनों नयन नुकीले बतलाओ थे कौन कलाप. रज्जू बिना छूटे आहत कर काजलमय हृत, करे विलाप ला वह चाप कौन-सी है, यदि कलाकार बनते हो आप. [यह कविता 'ढाल' नामक...
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Pratul
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[16 May 2010 12:40 PM]



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