कविता
यथार्थ झाँक कर देखा खिड़की से उमड़ते हुए बादलों को दौड़ कर आँगन में आया | और आकाश में बादलों का एक झुंड पाया | और शुरू हो गया तलाश का एक अंतहीन सिलसिला अचानक खिल उठा चेहरा |और प्रसन्न हुआ अंतर्मन क्योंकि मिल गयी थी...
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Sunil Kumar
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[16 May 2010 11:13 AM]



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