शैलबाला शतक
जीवन में ऐसे क्षण अपनी आवृत्ति करने में नहीं चूकते जब जीवन का केन्द्रापसारी बल केन्द्राभिगामी होने लगता है । मेरे बाबूजी की ज़िन्दगी की उसी बेला की उपज है ’शैलबाला शतक’! अनेकों झंझावातों में उलझी हुई जीवन की गति को जगदम्बा की ही शरण सूझी ।...
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हिमांशु । Himanshu
काली
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[16 May 2010 10:45 AM]



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