गर्मीयां......

दिशाएं पेड़ की ओट में अपने बच्चों को समेटती इन गर्म हवाओं और लू की मार सहती वह गरीब औरत जो राजधानी मे पेट भरने को आई थी परिवार के साथ... सोच रही होगी- इस पूरी गर्मी को.... मेरे कितने बच्चे देख पाएगें? कितने वापिस गाँव जाएगें? ...... [पूरी पोस्ट]
writer परमजीत सिँह बाली
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[15 May 2010 21:03 PM]

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