क्यों जीता हुँ, दुनियाँ के ढग से,

माथापच्ची ( मेरे मन की उथल पुथल ) क्यों जीता हुँ, दुनियाँ के ढंग से,क्यों मिटाता हुँ, खुद को खुद मे से ही, दुनियाँ के डर से,चाहता हुँ, सडक पर खेल रहे बेफ्रिक बच्चो की तरह खेलना, अपना पसंदीदा पुराने कपडे पहन कर घुमना, चाहता हुँ, जमीन पर बैठ कर उंगलियाँ चाट कर खाना, जब भी मन हो, जोर से... [पूरी पोस्ट]
writer Kapil Dev Sharma
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[16 May 2010 08:02 AM]

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