सीहोर का मुशायरा, हठीला जी के घर काव्य-गोष्ठी और वो टैक्सी वाला
श्री विद्या के उपासकों के बीच प्रचलित है- यत्रास्ति भोगो न च तत्र मोक्षः यत्रास्ति मोक्षो न च तत्र भोगः। श्रीसुंदरी सेवनतत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव॥ जहां भोग है, वहां मोक्ष नहीं और जहां मोक्ष है वहां भोग नहीं। लेकिन त्रिपुरसुंदरी के आराधक को भोग...
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रविकांत पाण्डेय
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[16 May 2010 07:21 AM]



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