अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ? त्रिवेणी की कोशिश!
याद जब भी आती है, तो आँखें नाम हो ही जाती हैं,तेरी बातों की यादों में, ये ग़ोते लगाती हैं ,!!!अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ?...
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nadeem
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[16 May 2010 04:58 AM]



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