बखत के घोड़ा
खावत हे, पियत हेरातदिन मारा-मारी जियत हेबिन लगाम दउड़त हेबखत के घोड़ा।रात हर दिन हो जाथेदिन हर रात हो जाथेबिन काम होय आरामलागथे मनखे ल हरामआज ये डहरकाल ओ डहरये शरीर बन जाथेकोदो कस गरू बोराबखत के घोड़ा।चलगे जेकर पांव के टापूमुड़ के नई देखय पाछूयेहर अपन मंजिल...
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संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari
श्यामू विश्वकर्मा
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[16 May 2010 04:42 AM]



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