न्याय और कुछ नहीं !
ये विरोध है, उस अन्याय के ख़िलाफ जो अब बर्दाश्त नहीं।विरोध उन सामंतों के खिलाफ जो अभी भी हमारी सोच में सांसे ले रहा है।हमारे ज़ुबान बंद हैं, पर सीनों में चित्कार है। न्याय मिले जल्दी, क्योंकि देर पहले ही बहुत हो गई है।ठेकेदार ठेका ले और दे चुके अपना...
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Omprakash Das
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[16 May 2010 00:39 AM]



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