कविताएँ
महँगाईबढ़ती हुई महंगाई की चिंताअब हमें भी होने लगी है |क्योंकि हमारी फटी मैली कमीज में लगे ,बदरंग बटनों का स्थान आलपिन लेने लगी हैयह यूँही बढ़ती जाएगी |यह एक दिन आसमान को छू जाएगी |तब ज़मीन और आसमान के बीच,का फासला कुछ भी नहीं रह जायेगाऔर आदमी ज़िन्दगी के...
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Sunil Kumar
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[22 Apr 2010 09:06 AM]



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