नयन-मर्यादा
ओ दूर-दूर रहने वाले! हमसे भी दो बातें कर लो. इतना दूर नहीं रहते जो मिलने में भी मुश्किल हो. मौन बहुत रहते हो, दूरी पहले से, ये चुप छोड़ो. कभी-कभी तो आते हैं, मिलते हैं. हमसे हँस बोलो. जितना आते पास तिहारे उतना नयन झुकाते हो. लज्जा है ये नहीं...
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Pratul
मौन
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[15 May 2010 15:29 PM]



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