तीन कवितायें
1, प्रतिक्षा के अग्नि कुंड मेंसमय की समिधायेंडाल-डाल उम्र को हवन कर दियाऔरइस तप का प्रतिफल ये मिला किअब आस्तिक न रहा।2, विरह की लपटों से झुलसी लगभग राख हुई उम्रइस नंगी-रुखीहवा के बदन से लिपटजीवन के चारों ओरभंवर बनानाचने लगी हैमानों यह अंतिम नृत्य साधना...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[15 May 2010 13:18 PM]



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